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भिलाई। ब्रह्माण्ड की शुरुआत में सुपरमैसिव मॉन्स्टर ब्लैक होल के उद्भव के लिए भी डार्क मैटर ही जिम्मेदार था। इस विषय पर शोध कर अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई के भौतिकी विभाग के वैज्ञानिकों, पीएचडी छात्र रितिक शर्मा और उनके गाइड डॉ महावीर शर्मा ने युवा ब्रह्मांड में नवगठित आकाशगंगाओं में सुपरमैसिव ब्लैक होल की उत्पत्ति की वजह ढूंढ निकाली है, जो रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के जर्नल एमएनआरएएस में प्रकाशित हुई है।
इस मौलिक शोधपत्र के लेखक रितिक शर्मा और डॉ. महावीर शर्मा ने बताया कि केंद्रीय ब्लैक होल के लिए दूसरा तीव्र वृद्धि चरण बेहद महत्वपूर्ण होता है और आकाशगंगा का डार्क मैटर इसका जिम्मेदार है। डार्क मैटर मतलब अदृश्य पदार्थ, इसे हम देख नहीं सकते लेकिन ये हर जगह है और यह हमारे ब्रह्मांड की वास्तविकता है। आकाशगंगाएँ भी डार्क मैटर के अंदर ही पनपती हैं। वास्तव में, डार्क मैटर की एक ‘अदृश्य’ गोलाकार सरंचना के अंदर मौजूद ‘दृश्य’ सितारों के समूह को ही आकाशगंगा कहते हैं। डार्क मैटर हमारे ब्रह्माण्ड की हकीकत है और यह सर्वव्यापी आधार संरचना है जिसमें रंग बिरंगी आकाशगंगाएं और उनके भीतर तारे विकसित होते हैं, जो हमें रात को आकाश में नजर आते हैं।
शोध के द्वारा बताया गया कि लगभग हर आकाशगंगा के केंद्र में एक अत्यधिक भारी `सुपरमैसिव’ ब्लैक होल होता है, यहां तक कि हमारी अपनी आकाशगंगा में भी, जो एक मॉन्स्टर(दैत्य) की तरह अपने आस पास के पदार्थ और सौरमंडलों को निगलता रहता है। ऐसे मॉन्स्टर ब्लैक होल आमतौर पर सामान्य ब्लैक होल की तुलना में दस लाख गुना अधिक भारी होते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे एक अरब वर्ष से अधिक के जीवनकाल के दौरान आकाशगंगा के तारामंडलों को निगल कर बढ़ते हैं। लेकिन हाल ही में नवगठित आकाशगंगाओं में भी ऐसे ही मॉन्स्टरब्लैक होल्स की मौजूदगी का पता चला है; हालाँकि तब ब्रह्मांड युवा था, और इसकी आयु केवल 4 करोड़ वर्ष थी जोकि वर्तमान आयु 14 अरब वर्ष की तुलना में बेहद कम है। उस समय हमारा सौरमंडल तो दूर, हमारी आकाश गंगा दुग्ध मेखला भी अस्तित्व में नहीं थी, लेकिन मॉन्स्टर ब्लैक होल बन चुके थे जो कि एक अनसुलझा रहस्य है।
इस अध्ययन से पता चला है कि केंद्रीय ब्लैक होल का विकास दो चरणों में होता है। शुरुआती पहले चरण में, केंद्र में एक छोटा ब्लैक होल धीमी गति से बढ़ता है, जोकि सर्वविदित है और ये बात ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी हरमन बॉन्डी ने 1949 में प्रस्तावित की थी। इसी कड़ी में भारतीय वैज्ञानिकों ने अब सुझाया है की, पहले धीमे चरण के बाद, फिर एक महत्वपूर्ण दूसरा चरण होता है, जिसमें आकाशगंगा का डार्क मैटर, केंद्रीय ब्लैक होल के बढ़ने की रफ़्तार को अपने नियंत्रण में ले लेता है, और इसे कई गुना बढ़ा देता है, जिससे ब्लैक होल का तेजी से विकास होता है और वह एक ऐसे मॉन्स्टर ब्लैक होल में तब्दील हो जाता है, जिसका द्रव्यमान लाखों सूरज से भी अधिक होता है। ये बता दें की नासा द्वारा पिछले साल लॉन्च किए गए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) द्वारा ब्रह्मांडीय भोर में हाल ही में कई ऐसे मॉन्स्टर ब्लैक होल खोजे गए थे, और अब भारतीय वैज्ञानकों के शोधपत्र ने इनकी उत्पत्ति का रहस्य उजागर कर दिया है।