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रायपुर ( न्यूज़)। जिस सरगुजा के बूते इस बार भाजपा प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब रही, वहां का संसदीय इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है। 8 विधानसभाओं वाले सरगुजा लोकसभा क्षेत्र में विगत 4 चुनाव से भाजपा जीतती रही है और यह कारनामा तब हुआ है, जब वहां हर बार पार्टी ने अपना प्रत्याशी बदला है। 2019 के चुनाव में यहां से रेणुका सिंह ने जीत हासिल की और केन्द्रीय मंत्री बनीं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि हर बार प्रत्याशी बदलने का रिकार्ड भाजपा बरकरार रखेगी या फिर रेणुका सिंह को एक बार फिर रिपीट किया जाए? हालिया सम्पन्न विधानसभा चुनाव में पार्टी रेणुका सिंह भरतपुर सोनहत से विधायक निर्वाचित हुई थीं, जिसके बाद उन्होंने सांसद पद छोड़ दिया था। वे सीएम पद की प्रमुख दावेदार भी रहीं। फिलहाल दोनों ही दलों से कई प्रत्याशियों के नाम चर्चा में हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस यहां अपने लिए गुंजाइश तलाश रही है, जबकि भाजपा इस सीट को जीता हुआ मानकर चल रही है।
माना जाता था कि छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी बस्तर से मिलती है। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में यह चाबी भाजपा को सरगुजा से मिली। सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटें भाजपा ने जीतीं तो इस क्षेत्र को पहली बार प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर भी मिला। विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री बने तो मंत्रिमंडल में भी कई विधायकों को जगह मिली। ऐसे में भाजपा को सरगुजा को लेकर आश्वस्त रहना अप्रासंगिक नहीं है। एसटी आरक्षित इस सीट में 8 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें अंबिकापुर, सीतापुर, लुंड्रा, बलरामपुर जिले की सामरी और रामानुजगंज-बलरामपुर. सूरजपुर जिले की प्रतापपुर, प्रेमनगर और भटगांव विधानसभा शामिल हैं। सरगुजा को भाजपा का गढ़ माना जाता है। विगत 4 चुनाव से यहां भाजपा लगातार जीत हासिल करती आई है। खास बात यह है कि पार्टी ने हर बार लोकसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी बदला और अपना परचम लहराया। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 2004 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में भाजपा से नंदकुमार साय ने चुनाव जीता था। इसके बाद 2009 में मुरारीलाल चुनाव जीतकर सांसद बने। फिर 2014 में भाजपा के कमलभान सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार रामदेव राम को हराया। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में रेणुका सिंह चुनाव जीतीं और मोदी कैबिनेट में उन्हें केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया गया।
रेणुका की मजबूत दावेदारी
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में रेणुका सिंह ने भरतपुर-सोनहत से चुनाव जीता और फिर सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। रेणुका सिंह सीएम रेस में भी सबसे आगे चल रही थीं, लेकिन न तो वो सीएम बनीं और न ही उन्हें साय कैबिनेट में जगह मिली। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि सरगुजा से एक बार फिर से रेणुका सिंह टिकट की दावेदार हो सकती हैं। वहीं 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर भाजपा में शामिल हुए चिंतामणि महाराज भी दावेदारों की लिस्ट में शामिल हैं। सामरी से विधायक रहे चिंतामणि महाराज ने अंबिकापुर से टिकट मांगा था, लेकिन भाजपा ने उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने का आश्वासन दिया था। इन दोनों के अलावा पूर्व सांसद कमलभान सिंह को भी पार्टी मौका दे सकती है। इनके अलावा संघ के करीबी माने जाने वाले विजयनाथ सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक पैकरा और रामलखन पैकरा को भी टिकट का दावेदार माना जा रहा है।
कांग्रेस में दावेदारों की भरमार
कांग्रेस की बात करें तो पार्टी विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय के बाद फूंक-फूंककर कदम रख रही है। सरगुजा को टीएस सिंहदेव का गढ़ कहा जाता था, लेकिन इस बार वे खुद अपनी विधायकी नहीं बचा पाए। जाहिर है कि ऐसे में कांग्रेस को सरगुजा लोकसभा सीट में कड़ी चुनौती मिलने के आसार हैं। कांग्रेस से टिकट के दावेदारों की चर्चा करें तो पूर्व शिक्षामंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। प्रतापपुर क्षेत्र से विधायक रह चुके प्रेमसाय सिंह का कांग्रेस ने इस बार टिकट काट दिया था। उनके अलावा खेलसाय सिंह की भी दावेदारी मजबूत है। वे प्रेमनगर से 4 बार विधायक और 3 बार सांसद रह चुके हैं। हालांकि इस बार वे चुनाव हार गए थे। इन दोनों के अलावा अंबिकापुर के महापौर डॉ अजय तिर्की भी टिकट के दावेदारों में हैं। इस बार रामानुजगंज से कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वे भी चुनाव हार गए थे। वहीं 2009 में कांग्रेस की तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ चुके रामदेव राम भी दावेदारों की लिस्ट में हैं। फिलहाल इन नामों को लेकर कयास जारी है।
चूके हुए नेताओं से परहेज
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल चूके हुए नेताओं से परहेज कर रहे हैं। सरगुजा के राजनीतिक हालातों के मद्देनजर कांग्रेस हारे हुए नेताओं पर दाँव लगाने के मूड़ में नहीं है। टिकट दावेदारों पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक मंथन चल रहा है। दोनों दल जल्द से जल्द प्रत्याशी घोषित करने की मंशा रखते हैं। विगत विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आचार संहिता लगने से पहले ही बहुधा सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे। इसका पार्टी को फायदा भी हुआ। अब कांग्रेस भी इसी तर्ज पर समय से पहले प्रत्याशी घोषित करना चाह रही है। भाजपा की तैयारियां को अंतिम चरणों में है। माना जा रहा है कि सप्ताहभर के भीतर छत्तीसगढ़ की 5 से 6 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए जाएंगे। कांग्रेस आलाकमान भी दिल्ली में नामों पर मंथन कर रहा है। 2019 में कांग्रेस के जिन 2 सांसदों ने चुनाव जीता था, उन्हें एक बार फिर रिपीट करने की तैयारी है। कहा जा रहा है कि यदि कोरबा में ज्योत्सना महंत का टिकट कटता है तो उनके पति चरणदास महंत को उम्मीदवार बनाया जाएगा। बस्तर से दीपक बैज की टिकट पक्की है।
ऐसा है सरगुजा का इतिहास
सरगुजा लोकसभा सीट अस्तित्व में आने के प्रारंभिक 20 साल तक यहां कांग्रेस का कब्जा रहा है। वर्ष 1951 में पहला आम चुनाव हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के सीएस सिंहदेव और बाबूनाथ सिंह दोनों ही सांसद निर्वाचित हुए। इसके बाद 1957 के लोकसभा चुनाव में भी यही पुनरावृत्ति हुई। वर्ष 1962, 1967 और 1971 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा। कांग्रेस को 1977 में आपातकाल विरोधी लहर का खामियाजा भुगतना पड़ा और यह सीट उसके हाथ से निकल गई। जनता पार्टी के लरंग साय ने यह चुनाव जीता। इसके बाद से यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच शह और मात का सिलसिला चला। वर्ष 1980 में कांग्रेस ने सरगुजा सीट हथिया ली और 1984 में भी अपना कब्जा बरकरार रखा। लरंग साय ने 1989 में एक बार फिर जीत हासिल कर यह सीट भाजपा की झोली में डाली। कांग्रेस ने 1991 में लरंग साय के खिलाफ खेलसाय सिंह को चुनाव में उतारा। खेलसाय सिंह इस चुनाव में विजयी रहे। उन्होंने 1996 के चुनाव में जीत दोहराई। वर्ष 1998 में भी ये दोनों प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने थे और लरंग साय चुनाव जीते लेकिन 1999 में खेलसाय ने उन्हें परास्त कर दिया। वर्ष 2004 में भाजपा ने फिर बाजी पलट दी और उसके बाद 2009 और 2014 और 2019 के चुनाव में लगातार जीत हासिल की। वर्ष 2003 से 2008 के बीच सरगुजा जिले के प्रेमनगर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक रहीं रेणुका सिंह को 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खेलसाय सिंह ने पराजित किया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने थे। जहां रेणुका सिंह ने एकतरफा जीत हासिल की।